पितृ पक्ष में नहीं मिल रहे पितरों के दूत…
पितृ पक्ष में नहीं मिल रहे पितरों के दूत…

फाइल फोटो,,
छत्तीसगढ़ से गायब हो रहे कौए!
रायपुर पितृ पक्ष चल रहा है लेकिन इस बार श्राद्ध करने वालों के सामने एक अजीब संकट खड़ा हो गया है। थाली में खीर-पूड़ी रखी है, पंडित मंत्र पढ़ रहे हैं, पर जिस कौए को पितरों का रूप मानकर पहला ग्रास दिया जाता है, वही कौआ गायब है। लोग सुबह से छत पर बैठकर कागा का इंतजार कर रहे हैं, पर कौआ ढूंढे से भी नहीं मिल रहा।सवाल उठ रहा है – क्या छत्तीसगढ़ से कौए सच में गायब हो रहे हैं?

पितृ पक्ष कब से कब तक?
इस साल पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर भाद्रपद पूर्णिमा से हुई है, प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर से प्रारंभ हुआ है और समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा। 15 दिन तक लोग अपने पूर्वजों को तर्पण और काक बलि देंगे।
क्यों इतना जरूरी है कौआ?
हिंदू शास्त्रों में कौए को सिर्फ एक पक्षी नहीं, पितरों का दूत माना गया है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज कौए का रूप लेकर धरती पर भोजन करने आते हैं। इसे यमराज का दूत भी कहा जाता है।
रामायण में कथा है कि जयंत, जो इंद्र का पुत्र था, ने कौए का रूप धारण किया था, तब श्रीराम ने उसे वरदान दिया था कि कौए को खिलाया गया भोजन सीधा पितरों तक पहुंचेगा। शास्त्रों में श्राद्ध के दौरान 5 जीवों – कौआ, गाय, कुत्ता, चींटी और देवता के लिए भोजन निकालने का विधान है। कौए के हिस्से को *काक बलि* कहते हैं। मान्यता है कि जब तक कौआ भोजन ग्रहण न करे, श्राद्ध अधूरा है। कौए का खाना ही इस बात का संकेत है कि पितर तृप्त हुए।
फिर कौए जा कहां रहे हैं?
गांव-गांव में दो तरह की चर्चाएं हैं। बुजुर्ग कह रहे हैं – कौए शहर छोड़कर जंगल की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। वहीं पर्यावरणविदों की चिंता अलग है। उनका कहना है कि बढ़ते प्रदूषण, मोबाइल टावरों के रेडिएशन, प्लास्टिक कचरा और खाने की कमी से कौओं की संख्या तेजी से घट रही है। पहले जो कौए हर गली-मोहल्ले में झुंड में दिखते थे, अब गिने-चुने ही नजर आते हैं। यह विलुप्ति की घंटी है।
रायपुर वालों के लिए एक सुकून भरी खबर,
जहां पूरे प्रदेश में लोग कौए ढूंढ रहे हैं, वहीं राजधानी रायपुर के *बूढ़ा तालाब* में आज भी कौए आसानी से मिल जाते हैं। यहां कुछ पक्षी प्रेमी साल भर कौओं को दाना-पानी देते हैं। एक 1 मिनट 6 सेकेंड के वीडियो में तो साफ दिख रहा है कि कैसे एक शख्स की आवाज पर दर्जनों कौए झुंड में आ जाते हैं और उसके हाथ से खाना खा रहे हैं। ऐसा नजारा अब दुर्लभ हो गया है।
लेकिन हर जिले में बूढ़ा तालाब जैसा नहीं है। पर्यावरण प्रेमियों ने चेताया है कि अगर समय रहते कौओं के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले सालों में श्राद्ध के लिए कौआ मिलना और भी मुश्किल हो जाएगा। पितरों के दूत को बचाना अब सिर्फ धार्मिक नहीं, पर्यावरणीय जरूरत भी बन गया है।

